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चिंताजनक : नाममात्र रह गया जयदा टुसू मेला, टुसू और सांस्कृतिक गीत ही हुआ विलुप्त

विश्वरूप पांडा : आज मकर संक्रांति से झारखंडी समाज का प्राचीन परंपरा और त्यौहार टुसू पर्व की धूम मची है। आज से ही झारखंड के कोने कोने में टुसू मेला का आयोजन हो रहा है। अगले कई दिनों तक टुसू मेला का आयोजन होगा। जहां कई जगहों पर आकर्षक टुसू कमिटी या टुसू बनाने वाले को सम्मानित किया जाएगा। पर, वर्तमान समय में झारखंडी समाज के ऐतिहासिक परंपरा और संस्कृति पर संकट के बादल छाए हुए हैं। झारखंड की कला, संस्कृति विलुप्त होती जा रही हैं। इसका मूल कारण राज्य सरकार की अनदेखी है। सरकार की ओर से झारखंडी समाज के परंपरा और संस्कृति के संरक्षण के दिशा में पहल नहीं होना सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है।

सरकार के अनदेखी के चलते अब तक कई प्रसिद्ध मेला, परंपरा, कला, संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर है। कई मेले का स्वरूप बदल गया है। रही सही कसर को राज्य के प्रशासनिक अधिकारी पूरा कर रहे हैं। सुरक्षा और विधि व्यवस्था के नाम पर लगातार पूजा, पाठ, परंपरा, संस्कृति, मेला इत्यादि पर प्रहार किया जा रहा है। एक तरह से तुष्टिकरण की झलक भी देखने को मिलती हैं। वहीं, मेलों के बदलते स्वरूप के लिए सरकार और प्रशासन की तरह सामाजिक संगठन और मेला के आयोजक भी जिम्मेदार हैं। आए दिन सामाजिक संगठनों के नेता मंच से भाषणबाजी करते देखे जाते हैं, लेकिन काश वह अपने भाषण के अनुसार काम भी करते तो शायद परंपरा और संस्कृति का संरक्षण होता। लेकिन, उन्हें तो बस राजनीतिक रोटी सेंकने और अपना स्वार्थ सिद्धि से मतलब है।

जयदा टुसू मेला का इतिहास

अब बात करते हैं झारखंड के जयदा टुसू मेला की, जहां एक समय सैकड़ों की संख्या में टुसू आते थे। 100 – 150 फिट के चौड़ल को देखने के लिए दूर दराज के लोग पहुंचते थे। लेकिन बीते कुछ साल से जयदा में एक भी टुसू के दर्शन नहीं होते हैं।

सरायकेला – खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड का जयदा सभी दृष्टिकोण से ऐतिहासिक स्थल है। जयदा गोलीकांड का शहीद स्थल है। वहीं, यहां प्राचीन शिव मंदिर भी है। इसके साथ साथ जयदा टुसू मेला भी काफी ऐतिहासिक है। सैकड़ों साल पुराने जयदा मेला में अब टुसू देखने को नहीं मिलती हैं और न ही टुसू गीत सुनाई देती हैं। इसे कोल्हान का सबसे बड़ा मेला माना जाता था, लेकिन अब इसका अस्तित्व खतरे में है। टुसू मेला के नाम पर अब लोग जुटते जरूर है लेकिन टुसू मेला का आनंद का अहसास नहीं होता है।

आज भी बुजुर्गों से जानकारी मिलती हैं कि पहले चांडिल, नीमडीह, ईचागढ़, कुकडू, सरायकेला, खरसावां, तमाड़, सिल्ली, पटमदा आदि जगहों से लाखों लोग अपने परिवार के साथ मकर संक्रांति के दिन सुबह जयदा पहुंचते थे। बाउंड़ी की शाम को अपने घरों में पीठा, मुड़ी, मांस, मछली खाते थे और रात को ही टुसू लेकर जयदा के लिए निकल जाते थे। लोग घर के बने पीठा, मुड़ी इत्यादि भी अपने साथ में बांध लेते थे। 50 – 60 किलोमीटर का सफर पैदल अथवा बैलगाड़ी से तय करते थे। इस दौरान टुसू गीत गाया जाता था और ढोल नगाड़ों की धुन पर सभी झूमते हुए तड़के सुबह जयदा पहुंच जाते थे। जयदा के सुवर्णरेखा नदी में मकर संक्रांति की डुबकी लगाकर जयदा शिव मंदिर में पूजा अर्चना के बाद सामूहिक रूप से पीठा, मुड़ी खाकर टुसू गीतों पर नाच गाना होता था। दिनभर उत्साह का माहौल बना रहता था। यहां लाए जाने वाले बड़े – बड़े चौड़ल को देखने के लिए भी काफी संख्या में लोगों की भीड़ जमा होती थी। वहीं, शाम को सभी अपने टुसू को सुवर्णरेखा नदी में विसर्जन कर अपने घरों की ओर रवाना हो जाते थे।

वर्तमान समय में उन दिनों की तुलना उतनी भीड़ नहीं होती हैं। वहीं, अब मेला का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है। अब मकर (पौष) संक्रांति के दिन काफी कम लोग सुवर्णरेखा नदी में स्नान करने आते हैं। संक्रांति के दिन मेला नहीं लगता है। अब संक्रांति के दूसरे दिन आख्यान यात्रा से तीन दिन तक मेला लगता है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जब से प्रशासन ने मेले में विधि व्यवस्था की जिम्मेदारी ली है, तब से हर साल नियमों में परिवर्तन हो रहा है। हर साल मेले में नए नए नियम लाकर, मेले के स्वरूप में परिवर्तन किया जा रहा है। वहीं, सुविधा के नाम पर लोगों को कुछ भी सुविधा नहीं मिलता है। औपचारिक रूप से प्रशासन द्वारा एक शिविर लगाया जाता है और पुलिस द्वारा भीड़ पर नियंत्रण किया जाता है।

जबकि, पहले अलग – अलग संगठनों द्वारा शिविर लगाया जाता था और उनके द्वारा टुसू को पुरस्कृत किया जाता था। वहीं, चारो ओर टुसू के गीत बजते थे। ग्रामीण भी टुसू गीत गाते थे। अब प्रशासन ने नया नियम लाकर टुसू गीत भी बंद करा दिया है। प्रशासन ने किसी भी शिविर में या संगठनों को माइक न लगाने का फरमान जारी किया है। केवल प्रशासनिक शिविर में माइक लगेंगे, पर क्या उस माइक से टुसू गीत बजाए जाएंगे? शायद नहीं, प्रशासन द्वारा टुसू गीत बजाए जाने की संभावना न के बराबर है। पहले अलग – अलग संगठनों द्वारा लोगों को टुसू की शुभकामनाएं देने के लिए चारो ओर होर्डिंग, बैनर लगाए जाते थे, उस पर भी प्रशासन ने रोक लगा दी है।

जबकि, इस तरह के नियम अन्य समाज के पूजा – संस्कृति और परंपरा में नहीं लागू किया जाता हैं। अन्य समाज द्वारा नदी घाटों पर मनाए जाने वाली पूजा, परंपरा में प्रशासन बढ़चढ़कर भाग लेती हैं और सुविधा उपलब्ध कराती हैं। कितनी अजीब बात है कि एक राज्य में अलग – अलग समाज के लिए अलग – अलग नियम लागू किए जा रहे हैं। जबकि सभी को अपने परंपरा के अनुसार पर्व त्यौहार मनाने की छूट दी जानी चाहिए, सबके लिए एक समान कानून होना चाहिए, सबको सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। भेदभावपूर्ण नियमों के कारण प्रशासन के इन नियमों को तुष्टिकरण की दृष्टि से देखा जा रहा है।

वैसे इसके लिए केवल वर्तमान सरकार अथवा वर्तमान में पदस्थापित अधिकारियों पर सवाल खड़े नहीं कर रहे हैं, बल्कि हर सरकार को इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। आजतक स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के दिशा में सरकार द्वारा किसी तरह की पहल नहीं किया गया है। वर्तमान हेमंत सरकार स्वयं को झारखंडी सरकार कहती हैं और वर्तमान में पदस्थापित अधिकारी भी स्वयं को झारखंड का स्थानीय बताते हैं। पर, सरकार और अधिकारियों की कार्यशैली से झारखंडियत की झलक देखने को नहीं मिल रही हैं। यदि वास्तव में यह सरकार झारखंडी और झारखंडियों के लिए ही होती तो आज प्रत्येक टुसू घाट की साफ सफाई प्रशासन द्वारा किया जा रहा होता। सभी टुसू मेलाओं में लाइट और माइक की व्यवस्था होती। माइक में टुसू के गीत बजते और मेले में आने वाले टुसूओं को सरकार द्वारा सम्मानित किया जाता। पर, ऐसा नहीं हो रहा है।

अब तो जयदा के ऐतिहासिक टुसू मेला से कुछ दिन पहले औपचारिकता पूरी करने के लिए नाममात्र एक बैठक होती हैं, जिसमें कितनी संख्या में पुलिस जवान को तैनात किया जाएगा, शिविर लगेगी, मेडिकल टीम होगी, प्रशासन के अलावा अन्य किसी के माइक नहीं लगेंगे, झंडा, बैनर नहीं लगेंगे इत्यादि जानकारी दी जाती हैं। बैठक में लोगों की ओर से दिए जाने वाले प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं सुना जाता है। जयदा मेला से पहले प्रशासन द्वारा नदी घाट तथा मेला स्थल की सफाई नहीं कराई जाती हैं। जैसा है, वैसे ही गंदगी में मेला लगा है। नेशनल हाईवे से मंदिर परिसर तक वाहनों के जाने – आने पर पाबंदी लगा दी गई हैं लेकिन बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों के लिए किसी तरह की वैकल्पिक व्यवस्था प्रशासन की ओर से नहीं है। सामाजिक संगठन और आयोजकों द्वारा भी इस दिशा में कोई पहल नहीं किया गया है।

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