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विशेष : पूरी जगन्नाथ मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी और रहस्यमयी रसोई

डेस्क : जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है। जो ओडिशा के पुरी में प्रभु जगन्नाथ जी के धाम मे स्थित है। यह रसोई विश्व की सबसे बड़ी और सबसे अद्भुत रसोई है।

जगन्नाथ धाम की यह रसोई मंदिर की दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। 32 कमरों वाली इस विशाल रसोई में भगवान् को अर्पित किये जाने वाले महाप्रसाद का निर्माण किया जाता है।

जगन्नाथ मंदिर की इस रसोई में महाप्रसाद को सम्पूर्ण रूप से तैयार करने के लिए 700 के करीब चूल्हे इस्तेमाल किये जाते हैं। जिसे लगभग 500 रसोइए तथा उनके 300 सहयोगी बनाते हैं। जगन्नाथ मंदिर की रसोई में पकाया जाने वाला सम्पूर्ण प्रसाद मिट्टी की जिन 700 हांडियों में पकाया जाता है, उन्हें ‘अटका’ के नाम से जाना जाता हैं।


जगन्नाथ मंदिर की रसोई में तैयार किया गया सम्पूर्ण भोग पूर्णतया सात्विक होता है। मीठे व्यंजन तैयार करने के लिए यहाँ चीनी के स्थान पर गुड़ प्रयोग में लाया जाता है। भोग के निर्माण में प्याज, लेहसुन आदि का उपयोग नही होता। मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की इस रसोई में जो भी भोग का निर्माण किया जाता है, वह माता लक्ष्मी की देखरेख में तैयार किया जाता है।

जगन्नाथ मंदिर की रसोई मे भोग का निर्माण करने के लिए जो जल प्रयोग मे लाया जाता है, वह मंदिर के समीप स्थित गंगा और यमुना नाम के दो कुंओं से लिया जाता है। केवल इनसे निकले पानी से ही भोग का निर्माण किया जाता है।

गिनीज बुक में दर्ज है जगन्नाथ मंदिर की रसोई

एक साथ आठ लाख़ लड्डू बनाने के लिए जगन्नाथ मंदिर की रसोई का नाम गिनीज़ बुक में भी दर्ज हो चुका है। जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रतिदिन एक बार में 50 हज़ार लोगों के लिए महाप्रसाद का निर्माण किया जाता है। मंदिर की रसोई में प्रतिदिन बहत्तर क्विंटल चावल पकाने की व्यवस्था है।

जगन्नाथ मंदिर की रसोई में रहस्यमयी ढंग से प्रसाद पकाया जाता है। रसोई में एक के ऊपर एक रखे हुए मिट्टी के 7 हांडियों में चावल पकाया जाता है। प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन जो एक-दूसरे पर रखे होते हैं, उसमे सबसे ऊपर रखे बर्तन में रखा हुआ भोजन सबसे पहले पकता है फिर नीचे की तरफ़ से एक के बाद एक बर्तन का प्रसाद पकता जाता है। आज तक इस रहस्य को कोई नहीं जान सका है कि कैसे इस तरह से प्रसाद पकाया जाता है।

जगन्नाथ मंदिर की इस रसोई में तैयार किया गया प्रसाद श्रद्धालुओं में बराबर हिस्से में वितरण किया जाता है। शाम होते ही मंदिर के कपाट बंद होने के साथ ही महाप्रसाद भी समाप्त हो जाता है। इस रसोई में तैयार किया गया प्रसाद ना तो कभी ज्यादा होता है और ना ही कभी कम पड़ता है।

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