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Seraikela / Kharswan

चांडिल : धरना स्थल पर विस्थापित फहराएंगे तिरंगा, 21 अगस्त को जल सत्याग्रह

फाइल फोटो – चांडिल डैम

सरायकेला – खरसवां। (विश्वरूप पांडा) चांडिल डैम के विस्थापित पिछले 16 जून से अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन पर हैं। अखिल झारखंड विस्थापित अधिकार मंच के बैनर तले चांडिल डैम के प्रभावित 116 गांव के विस्थापित अपनी दस सूत्री मांगों के समर्थन में आंदोलन कर रहे हैं। दस सूत्री मांगों में विस्थापितों को नौकरी, संपूर्ण मुआवजा, संपूर्ण पुनर्वास सुविधा, डैम का जलस्तर 177 मीटर आरएल रखने समेत अन्य शामिल हैं। परंतु, अभी कुछ दिनों से डैम का जलस्तर 180 मीटर आरएल के करीब स्थिर है। ईचागढ़, कुकडू तथा नीमडीह प्रखंड के कई गांवों तक डैम का पानी पहुंचने की कगार पर है। इसके चलते विस्थापित डरे सहमे हुए हैं, वहीं राज्य सरकार के प्रति आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं।

कल भारत के स्वतंत्रता दिवस के अवसर चांडिल स्थित पुनर्वास कार्यालय के समीप धरना स्थल पर ही विस्थापितों ने झंडोत्तोलन करने का निर्णय लिया है। यहां 116 गांव के विस्थापित उपस्थित होंगे और तिरंगा फहराया जाएगा। वहीं, आगामी 21 अगस्त को अपनी मांगों को लेकर जल सत्याग्रह करेंगे। बताया गया कि चांडिल डैम में 116 गांव के विस्थापित पहुंचेंगे और सरकार के खिलाफ हुंकार भरेंगे। फिलहाल चांडिल डैम के विस्थापित जलस्तर कम रखने की मांग पर जोर दे रहे हैं। आज जल सत्याग्रह आंदोलन को लेकर मंच के सदस्यों ने वर्चुअल चर्चा की, जिसमें बताया गया कि हजारों की संख्या में विस्थापितों द्वारा जल सत्याग्रह किया जाएगा।

डैम का जलस्तर 177 मीटर आरएल रखने की मांग को लेकर अखिल झारखंड विस्थापित अधिकार मंच की ओर से मुख्यमंत्री और विधायक सविता महतो को ज्ञापन सौंपा है। वहीं, विधायक सविता महतो ने भी बीते मानसून सत्र में जलस्तर 180 मीटर आरएल रखने की मांग की है लेकिन अभी तक सरकार की ओर से डैम के जलस्तर को घटाने की दिशा में पहल नहीं किया गया है।

सुवर्णरेखा बहुउद्देश्यीय परियोजना के तहत चांडिल डैम का निर्माण किया गया है, इस डैम के दौरान जिन लोगों की जमीन को अधिग्रहण किया है, उन्हें सरकारी नौकरी, जमीन के बदले मुआवजा राशि, पुनर्वास की सुविधाएं, स्वरोजगार, प्रशिक्षण इत्यादि उपलब्ध कराने की गारंटी दी गई थी। परंतु, सरकार ने जो वादे किए हैं उन्हें आजतक पूरा नहीं किया गया है, इसके चलते पिछले चार दशक से डैम के विस्थापित समय समय पर आंदोलन करते आ रहे हैं।

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